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शशि थरूर बोले– इमरजेंसी से सीखना जरूरी, लोकतंत्र को हल्के में नहीं लेना चाहिए, जानिए पूरा मामला

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Posted On:Thursday, July 10, 2025

मुंबई, 10 जुलाई, (न्यूज़ हेल्पलाइन)। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मलयालम अखबार ‘दीपिका’ में प्रकाशित अपने लेख में 1975 की इमरजेंसी को सिर्फ भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय मानने की बजाय उससे सीख लेने की बात कही है। उन्होंने लिखा कि अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर लिए गए फैसले कई बार अमानवीय रूप ले लेते हैं, जिन्हें किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने संजय गांधी के नेतृत्व में चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान को क्रूर और मनमाना बताया और कहा कि इस दौरान ग्रामीण इलाकों में टारगेट पूरे करने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया, वहीं नई दिल्ली जैसे इलाकों में झुग्गियों को बेरहमी से तोड़ा गया जिससे हजारों लोग बेघर हो गए।

थरूर ने अपने लेख में लोकतंत्र की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि यह एक बहुमूल्य विरासत है जिसे हर हाल में संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने चेताया कि सत्ता का केंद्रीकरण, असहमति को दबाना और संविधान को नजरअंदाज करने जैसी प्रवृत्तियां फिर से उभर सकती हैं और अक्सर इन्हें देशहित या स्थिरता के नाम पर सही ठहराने की कोशिश की जाती है। थरूर ने इमरजेंसी को लोकतंत्र के लिए एक स्थायी चेतावनी करार दिया और कहा कि लोकतंत्र के रक्षकों को हमेशा सतर्क रहना होगा। हाल ही में शशि थरूर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को लेकर एक अलग राय व्यक्त की थी जिससे कांग्रेस पार्टी के भीतर असहजता देखी गई। 23 जून को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित लेख में थरूर ने लिखा था कि प्रधानमंत्री मोदी की ऊर्जा, गतिशीलता और वैश्विक मंच पर संवाद स्थापित करने की उनकी इच्छा भारत के लिए एक बड़ी संपत्ति है। इस बयान के बाद कांग्रेस ने इसे थरूर की निजी राय बताया और कहा कि यह पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ लोगों के लिए ‘मोदी फर्स्ट’ है जबकि उनके लिए देश पहले आता है। उन्होंने यह भी कहा कि थरूर की अंग्रेजी बहुत अच्छी है, लेकिन वे पार्टी की प्राथमिकताओं को समझें। थरूर ने इस पर सफाई देते हुए मॉस्को में कहा कि उन्होंने सिर्फ प्रधानमंत्री की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता को लेकर सकारात्मक टिप्पणी की थी और यह भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ी थी, न कि किसी राजनीतिक दल की विदेश नीति से। हालांकि, कांग्रेस का रुख प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति को लेकर पूरी तरह अलग है। पार्टी लगातार आरोप लगा रही है कि भारत की कूटनीति कमजोर हो गई है और देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग पड़ गया है। कांग्रेस ने पहले अमेरिका की ओर से भारत यात्रा पर जारी एडवाइजरी को देश की छवि के लिए नुकसानदायक बताया और सरकार से इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराने की मांग की थी। वहीं, थरूर ने अतीत में भी भारत-पाक संघर्ष और विदेश नीति को लेकर कांग्रेस की लाइन से अलग विचार रखे हैं, जिससे यह साफ होता है कि पार्टी के भीतर मतभेद उभरते जा रहे हैं।


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